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Tuesday, June 16, 2015

क्या वेदों में बहु-विवाह आदि का विधान हैं?

शंका- क्या वेदों में बहु-विवाह आदि का विधान हैं?

समाधान- वेदों के विषय में एक भ्रम यह भी फैलाया गया हैं की वेदों में बहुविवाह की अनुमति दी गयी हैं।वेदों में स्पष्ट रूप से एक ही पत्नी होने का विधान बताया गया हैं।ऋग्वेद 10/85 को विवाह सूक्त के नाम से जाना चाहता हैं। इस सूक्त के मंत्र ४२ में कहा गया हैं तुम दोनों इस संसार व गृहस्थ आश्रम में सुख पूर्वक निवास करो। तुम्हारा कभी परस्पर वियोग न हो और सदा प्रसन्नतापूर्वक अपने घर में रहो। यहाँ पर हर मंत्र में "तुम दोनों" अर्थात पति और पत्नी आया हैं। अगर बहुपत्नी का सन्देश वेदों में होता तो "तुम सब" आता।ऋग्वेद 10/85/47 में हम दोनों (वर-वधु) सब विद्वानों के सम्मुख घोषणा करते हैं की हम दोनों के ह्रदय जल के समान शांत और परस्पर मिले हुए रहेंगे।अथर्ववेद 7/35/4 में पति पत्नी के मुख से कहलाया गया हैं की तुम मुझे अपने ह्रदय में बैठा लो , हम दोनों का मन एक ही हो जाये।अथर्ववेद7/38/4 पत्नी कहती हैं तुम केवल मेरे बनकर रहो और अन्य स्त्रियों का कभी कीर्तन व व्यर्थ प्रशंसा आदि भी न करो।ऋग्वेद 10/101/11 में बहु विवाह की निंदा करते हुए वेद कहते हैं जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं। इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना उचित नहीं हैं।इस प्रकार वेदों में बहुविवाह के विरुद्ध स्पष्ट उपदेश हैं। वेदों की अलंकारिक भाषा को समझने में गलती करने से इस प्रकार की भ्रान्ति होती हैं।

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