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Monday, June 15, 2015

भारतीय सनातन संस्कृति की दुनिया को देन

प्राचीन भारतीय विमान शास्त्र : सनातन वैदिक विज्ञान का अप्रतिम स्वरूप:- भाग:-3

"विमान-शास्त्री महर्षि शौनक" आकाश मार्ग का पाँच प्रकार का विभाजन करते हैं तथा "महर्षि धुण्डीनाथ" विभिन्न मार्गों की ऊँचाई पर विभिन्न आवर्त्त या तूफानोँ का उल्लेख करते हैं

और उस ऊँचाई पर सैकड़ों यात्रा पथों का संकेत देते हैं। इसमें पृथ्वी से १०० किलोमीटर ऊपर तक विभिन्न ऊँचाईयों पर निर्धारित पथ तथा वहाँ कार्यरत शक्तियों का विस्तार से वर्णन करते हैं।


आकाश मार्ग तथा उनके आवर्तों का वर्णन निम्नानुसार है -


(१) १० किलोमीटर - रेखा पथ - शक्त्यावृत्त तूफान या चक्रवात आने पर


(२) ५० किलोमीटर - वातावृत्त - तेज हवा चलने पर


(३) ६० किलोमीटर - कक्ष पथ - किरणावृत्त सौर तूफान आने पर


(४) ८० किलोमीटर - शक्तिपथ - सत्यावृत्त बर्फ गिरने पर


एक महत्वपूर्ण बात विमान के पायलटोँ को विमान मेँ तथा पृथ्वी पर किस तरह भोजन करना चाहिए इसका भी वर्णन है।

उस समय के विमान आज से कुछ भिन्न थे। आज के विमान की उतरने की जगह (लैँडिग) निश्चित है, पर उस समय विमान कहीं भी उतर सकते थे।


अतः युद्ध के दौरान जंगल में उतरना पड़ा तो जीवन निर्वाह कैसे करना चाहिए, इसीलिए १०० वनस्पतियों का वर्णन दिया गया है, जिनके सहारे दो-तीन माह जीवन चलाया जा सकता है। जब तक दूसरे विमान आपको खोज नहीँ लेते।


विमानिका शास्त्र में कहा गया है कि पायलट को विमान कभी खाली पेट नहीं उड़ाना चाहिए। १९९० में अमेरिकी वायुसेना ने १० वर्ष के निरीक्षण के बाद ऐसा ही निष्कर्ष निकाला है।


अब जरा विमानोँ मेँ लगे यंत्रोँ और उपकरणोँ के बारे मेँ तथ्य प्रस्तुत कियेँ जाएं -


"विमानिका-शास्त्र" में ३१ प्रकार के यंत्र तथा उनके विमान में निश्चित स्थान का वर्णन मिलता है। इन यंत्रों का कार्य क्या है इसका भी वर्णन किया गया है। कुछ यंत्रों की जानकारी निम्नानुसार है -


(१) विश्व क्रिया दर्पण - इस यंत्र के द्वारा विमान के आसपास चलने वाली गतिविधियों का दर्शन पायलट को विमान के अंदर होता था, इसे बनाने में अभ्रक तथा पारा आदि का प्रयोग होता था।


(२) परिवेष क्रिया यंत्र - ये यंत्र विमान की गति को नियंत्रित करता था।


(३) शब्दाकर्षण मंत्र - इस यंत्र के द्वारा २६ किमी. क्षेत्र की आवाज सुनी जा सकती थी तथा पक्षियों की आवाज आदि सुनने से विमान को "पक्षी-टकराने" जैसी दुर्घटना से बचाया जा सकता था।


(४) गर्भ-गृह यंत्र - इस यंत्र के द्वारा जमीन के अन्दर विस्फोटक खोजा जाता था।


(५) शक्त्याकर्षण यंत्र - इस यंत्र का कार्य था, विषैली किरणों को आकर्षित कर उन्हें ऊष्णता में परिवर्तित करना और ऊष्णता के वातावरण में छोड़ना।


(६) दिशा-दर्शी यंत्र - ये दिशा दिखाने वाला यंत्र था (कम्पास)।


(७) वक्र प्रसारण यंत्र - इस यंत्र के द्वारा शत्रु विमान अचानक सामने आ गया, तो उसी समय पीछे मुड़ना संभव होता था।


(८) अपस्मार यंत्र - युद्ध के समय इस यंत्र से विषैली गैस छोड़ी जाती थी।


(९) तमोगर्भ यंत्र - इस यंत्र के द्वारा शत्रु युद्ध के समय विमान को छिपाना संभव था। तथा इसके निर्माण में तमोगर्भ लौह प्रमुख घटक रहता था।


"विमानिका-शास्त्र" मेँ विमान को संचालित करने हेतु विभिन्न ऊर्जा स्रोतोँ का वर्णन किया गया है, महर्षि भारद्वाज इसके लिए तीन प्रकार के ऊर्जा स्रोतों उल्लेख करते हैं।


(१) विभिन्न दुर्लभ वनस्पतियोँ का तेल - ये ईँधन की भाँति काम करता था।


(२) पारे की भाप - प्राचीन शास्त्रों में इसका शक्ति के रूप में उपयोग किए जाने का वर्णन है। इसके द्वारा अमेरिका में विमान उड़ाने का प्रयोग हुआ,

पर वह जब ऊपर गया, तब उसमेँ विस्फोट हो गया। पर यह सिद्ध हो गया कि पारे की भाप का ऊर्जा की तरह प्रयोग हो सकता है, इस दिशा मेँ अभी और कार्य करने बाकी हैँ।


(३) सौर ऊर्जा - सूर्य की ऊर्जा द्वारा भी विमान संचालित होता था। सौर ऊर्जा ग्रहण कर विमान उड़ाना जैसे समुद्र में पाल खोलने पर नाव हवा के सहारे तैरता है।

इसी प्रकार अंतरिक्ष में विमान वातावरण से सूर्य शक्ति ग्रहण कर चलता रहेगा। सेटेलाइट इसी प्रक्रिया द्वारा चलते हैँ।


"विमानिका-शास्त्र" मेँ महर्षि भारद्वाज विमान बनाने के लिए आवश्यक धातुओँ का वर्णन किया है,

पर प्रश्न उठता है कि क्या "विमानिका-शास्त्र" ग्रंथ का कोई ऐसा भाग है जिसे प्रारंभिक तौर पर प्रयोग द्वारा सिद्ध किया जा सके?

यदि कोई ऐसा भाग है, तो क्या इस दिशा में कुछ प्रयोग हुए हैं?

क्या उनमें कुछ सफलता मिली है
सौभाग्य से इन प्रश्नों के उत्तर हाँ में दिए जा सकते हैं।


हैदराबाद के डॉ. श्रीराम प्रभु ने "विमानिक-शास्त्र" ग्रंथ के यंत्राधिकरण को देखा , तो उसमें वर्णित ३१ यंत्रों में कुछ यंत्रों की उन्होंने पहचान की तथा इन यंत्रों को बनाने वाली मिश्र धातुओं का निर्माण सम्भव है या नहीं ,

इस हेतु प्रयोंग करने का विचार उनके मन में आया । प्रयोग हेतु डॉ. प्रभु तथा उनके साथियों ने हैदराबाद स्थित बी. एम. बिरला साइंस सेन्टर के सहयोग से प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित धातुएं, दर्पण आदि का निर्माण प्रयोगशाला में करने का प्रकल्प किया और उसके परिणाम आशाष्पद हैं।


अपने प्रयोंगों के आधार पर प्राचीन ग्रंथ में वर्णित वर्णन के आधार पर दुनिया में अनुपलब्ध कुछ धातुएं बनाने में उन्हेँ सफलता मिली है।


(१) प्रथम धातु है "तमोगर्भ-लौह" इसके बारे मेँ हमने अभी ऊपर बताया है, विमानिका-शास्त्र में वर्णन है कि यह विमान को अदृश्य (स्टील्थ मोड मेँ डालने) करने के काम आता है।

इस पर प्रकाश छोड़ने से ये ७५ से ८० प्रतिशत प्रकाश को सोख लेता है। यह धातु रंग में काली तथा लेड से कठोर तथा कान्सन्ट्रेटेड सल्फ्‌यूरिक एसिड में भी नहीं गलती।


(२) दूसरी धातु जो उन्होँने बनाई है, उसका नाम है पंच लौह, यह रंग में स्वर्ण जैसी है तथा कठोर व भारी है ।

ताँबा आधारित इस मिश्र धातु की विशेषता यह है, कि इसमें सीसे का प्रमाण ७.९५ प्रतिशत है, जबकि अमेरिकन सोसायटी ऑफ मेटल्स ने कॉपर बेस्ड मिश्र धातु में सीसे का अधिकतम प्रमाण ०.३५ से ३ प्रतिशत संभव है यह माना है। इस प्रकार ७.९५ सीसे के मिश्रण वाली यह धातु विचित्र गुणोँ से परिपूर्ण है।


(३) तीसरी धातु का नाम है"ऑरर" यह ताँबा आधारित मिश्र धा ☀

इन अध्ययनोँ पर बनारस विश्वविद्यालय के एक रीडर ने कहा था


"This is the Study of Various Materials Described in Vimanika Shastra of Great Maharshi Bharadwaja"


इस प्रकल्प के तहत उन्होंने महर्षि भारद्वाज वर्णित दर्पण बनाने का प्रयत्न नेशनल मेटलर्जिकल लेबोरेटरी जमशेदपुर में किया तथा वहाँ के निदेशक पी.रामचन्द्र राव के साथ प्रयोग कर एक विशेष प्रकार का कांच बनाने में सफलता प्राप्त की, जिसका नाम "प्रकाश स्तंभनभिद् लौह" है।

इसकी विशेंषता है कि यह दर्शनीय प्रकाश को सोखता है तथा इन्फ्रारेड प्रकाश को जाने देता है।

इसका निर्माण कचर लौह – सिलिका, भूचक्र सुरमित्रादिक्षर - चूना
अयस्कान्त - इन खनिजोँ के द्वारा, अंशुबोधिनी में वर्णित विधि से किया गया है।


प्रकाश स्तंभनभिद् लौह की यह विशेषता है कि यह पूरी तरह से नॉन-हाईग्रोस्कोपिक है, नॉन-हाईग्रोस्कोपिक काँचों में पानी की भाप या वातावरण की नमी से उनका पॉलिश नहीँ हटता है, और वे सुरक्षित रहते हैं।


प्रकाश स्तंभनभिद् लौह के अध्ययन से यह सिद्ध हुआ है कि इन्फ्रारेड सिग्नल्स में यह आदर्श काम करता है तथा इसका प्रयोग वातावरण में मौजूद नमी के खतरे के बिना किया जा सकता है।


तो देखा आपने भारतीय हिँदू सभ्यता और सनातन संस्कृति का अनुपम वैज्ञानिक उदाहरण,


अगर आपने पूरा लेख ध्यान से पढ़ा होगा तो आपको पता चल गया होगा कि सनातन संस्कृति क्या है,


पूर्णतः वैज्ञानिक एवं तर्कपूर्ण विश्लेषण इसकी श्रेष्ठता को विस्तार देते हैँ,


अब रही बात उपरोक्त लेख को नकाराने वाले सेकुलरोँ की, तो इसमेँ उनकी कोई गलती नहीँ है, "क्योँकि विधर्मियोँ के शुक्राणुओँ वाली "हाइब्रिड-नस्ल" की संतानोँ की मानसिकता ऐसी ही होती है,


क्या विश्व में अन्य किसी देश के साहित्य में इन विषयों पर प्राचीन ग्रंथ हैं?


अब जरा अन्य देशोँ पर नज़र डाले तो कुछ इस तरह की कहानियाँ निकल के आऐँगी -


"पीटर नामक फरिश्ता अपने हंस जैसे चार पंख फैलाता है और आग की बारिश करते हुए उड़ जाता है",

"फिर माइकल नाम का फरिश्ता बत्तख के पंख काटकर अपने पीछे लगाता है और उड़कर स्वर्ग मेँ पहुँच जाता है","या फिर सलमा परी जख्मी अबू को उठाती है और उड़न-कालीन मेँ बिठाकर घर भेज देती है",

"फिर किसी हातिमताई को कोई व्हेल मछली के आकार का बाज उठाकर ले जाता है", "अब सिँदबाद आता है और काले बादलोँ के ऊपर बैठ कर दुनिया का चक्कर लगाने निकल पड़ता है",

"फिर कोई 'गुलफाम’ पंख लगे उड़ने वाले घोड़े पर सवार हो कर किसी ‘हसीन परी’ से शादी करने आ धमकता है",

"आखिर मेँ अलादीन एक चिराग रगड़ता है, और जिन्न महाशय एक जादुई कालीन हाथ मेँ लेकर प्रकट हो जाते हैँ, और फिर दोनोँ अपने बंदर के साथ कालीन मेँ बैठकर रेगिस्तान के बीच मेँ बने सुल्तान के महल मेँ "शैताने-वाहियात " को मारने निकल पड़ते हैँ।"

कहने का तात्पर्य ये है कि भारतीय सनातन संस्कृति के आगे किसी भी तरह की ''मिथ्या'' कहीँ नहीँ ठहर सकती

इतने वैज्ञानिकता से परिपूर्ण तथ्य सिर्फ सनातनी ही दे सकते हैँ

भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता पर गर्व कीजिए

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